दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र की ओर से आयोजित एक विचारोत्तेजक व्याख्यान कार्यक्रम में वरिष्ठ विद्वान एवं लेखक पूर्व मुख्य सचिव, उत्तराखण्ड,इंदुकुमार पांडे ने भारतीय आध्यात्मिक परम्पराओं, मनोविज्ञान और सांस्कृतिक संवाद पर आधारित अपने दार्शनिक उपन्यास ‘ दैट दाउ आर्ट: द अननॉन डायमेंशन ‘ की अवधारणा एवं उसके विभिन्न आयामों पर विस्तार से प्रकाश डाला। यह पुस्तक मोती लाल बनारसीदास इण्टरनेशनल से प्रकाशित हुई है।
श्री एन. रवि शंकर, मानद निदेशक ने इस कार्यक्रम की अध्यक्षता की और डॉ. संजीव चोपड़ा ने इस विषय पर चर्चा करते हुए अपने विचार श्रोताओं के समुख व्यक्त किए।
अपने वक्तव्य में इंदुकुमार पांडे ने कहा कि यह उपन्यास भारतीय आध्यात्मिक ज्ञान-परम्पराओं की पृष्ठभूमि में रचित एक चिंतनशील कृति है, जिसमें प्राचीन भारतीय दर्शन, आधुनिक मनोविज्ञान और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के बीच संबंधों की पड़ताल की गई है। उन्होंने बताया कि उपन्यास की मुख्य पात्र अन्ना लिंडरमायर योग और वेदान्त में वर्णित मनोवैज्ञानिक अवधारणाओं को समझने के उद्देश्य से भारत आती है और उसकी यात्रा आत्म-अन्वेषण, सांस्कृतिक संवाद तथा चेतना की गहराइयों की खोज में परिवर्तित हो जाती है।
पांडे ने आगे कहा कि यह पुस्तक केवल एक कथा नहीं, बल्कि मनुष्य के भीतर चलने वाले बौद्धिक और आध्यात्मिक संघर्षों की यात्रा है। इसमें हिंसा और करुणा, तर्क और अंतर्ज्ञान, तथा आधुनिक जीवन की जटिलताओं के बीच अर्थ की खोज जैसे प्रश्नों को उठाया गया है। उन्होंने आगे यह भी बताया कि अन्ना की यात्रा पश्चिमी मनोविश्लेषण की सुव्यवस्थित दुनिया से भारतीय दर्शन के प्रतीकात्मक और आध्यात्मिक क्षेत्र तक पहुँचती है, जहाँ उसे आत्मबोध के नए आयाम दिखाई देते हैं।
इंदुकुमार पांडे ने यह भी कहा कि उपन्यास की पृष्ठभूमि समकालीन भारत के विविध प्राकृतिक और सामाजिक परिवेशों में विकसित होती है। वन, पर्वत, नदियाँ, आश्रम और ग्रामीण जीवन केवल दृश्य नहीं हैं, बल्कि वे आत्म-परिवर्तन और आत्म-अन्वेषण के प्रतीक भी हैं। उन्होंने कहा कि प्रकृति, स्मृति और मिथक इस कथा के महत्वपूर्ण तत्व हैं, जो इसे गहरी मनोवैज्ञानिक और प्रतीकात्मक अर्थवत्ता प्रदान करते हैं।
उन्होंने आगे बताया कि पुस्तक में वेदान्त और योग-दर्शन के साथ-साथ बौद्ध दर्शन, चार्वाक भौतिकवाद तथा अद्वैत चिंतन जैसे विविध दार्शनिक दृष्टिकोणों पर भी विचार किया गया है। पांडे ने कहा कि यह कृति किसी एक विचारधारा को श्रेष्ठ सिद्ध करने का प्रयास नहीं करती, बल्कि विभिन्न परम्पराओं के बीच संवाद स्थापित करती है। साथ ही आध्यात्मिक अवधारणाओं के बढ़ते व्यावसायीकरण और उनके मूल अर्थों के क्षरण पर भी गंभीर प्रश्न उठाती है।
चर्चा के दौरान डॉ. संजीव चोपड़ा ने कहा कि इस प्रकार की कृतियाँ भारतीय ज्ञान-परम्परा को आधुनिक संदर्भों में समझने का अवसर प्रदान करती हैं तथा मनोविज्ञान और दर्शन के अंतर्संबंधों को नए दृष्टिकोण से देखने की प्रेरणा देती हैं।
अध्यक्षीय उद्बोधन में श्री एन. रवि शंकर ने कहा कि भारतीय और पाश्चात्य चिंतन के बीच संवाद आज की आवश्यकता है तथा ऐसी रचनाएँ वैश्विक स्तर पर सांस्कृतिक समझ को समृद्ध करती हैं।
कार्यक्रम के प्रारम्भ में स्वागत दून पुस्तकालय एवं शोध केन्द्र के कार्यक्रम अधिकारी चंद्रशेखर तिवारी द्वारा किया गया।
कार्यक्रम के अंत में श्रोताओं ने विषय से संबंधित अनेक प्रश्न पूछे, जिनका इंदुकुमार पांडे ने विस्तार से उत्तर दिया। प्रश्नोत्तर सत्र में पुस्तक की वैचारिक पृष्ठभूमि, भारतीय मनोविज्ञान और समकालीन समाज में आध्यात्मिकता की भूमिका पर सार्थक चर्चा हुई।
अंत में धन्यवाद ज्ञापन के साथ कार्यक्रम का समापन हुआ। आज के इस कार्यक्रम में एन एस नपलच्याल, अनिल रतूड़ी, लवनीना मोदी,पीसी तिवारी, कमला पंत, मुख्य सूचना आयुक्त राधा रतूड़ी,डॉ. पंकज नैथानी, डॉ. डी. के. पाण्डे, सुधीर सिंह बिष्ट, डॉ. लालता प्रसाद, जय प्रकाश खंकरियाल,के.बी. नैथानी, भूमेश भारती, जय भगवान गोयल, अजय जोशी, अनूप नौटियाल, प्रमोद कांत, डी. के. काण्डपाल श्रीमती लीना पाण्डे, सुंदर सिंह बिष्ट, सहित कई लेखक, साहित्यकार व शहर के बुद्धिजीवी लोग उपस्थित रहे.