पूर्व प्रधान लीला शर्मा जी ने बताया कि गोरखा समुदाय में ऋषि पंचमी का व्रत और पूजा विशेष श्रद्धा के साथ की जाती है। उन्होंने बताया कि इस परंपरा में महिलाएँ सुबह लगभग 3 से 3:30 बजे के आसपास नदी या जलस्रोत पर स्नान करने जाती हैं और 365 दत्योंन चबाने सहित विभिन्न धार्मिक विधियों का पालन करती हैं।
इस दौरान अलग-अलग प्रकार की मिट्टी, जैसे हाथी के पैर की मिट्टी, कमलकोटी, आँवला, बाँस और तुलसी की मिट्टी का प्रयोग करके स्नान किया जाता है। इसके बाद दीपक, धूप, फूल और धूबरा अर्पित कर भगवान से प्रार्थना की जाती है।
इसके बाद महिलाएँ चौपाल, मंदिर या किसी के घर पर एकत्र होकर पंडित जी के द्वारा ऋषि पंचमी की पूजा करती हैं। पूजा में 365 बेलपत्र, 365 धूबरा, 365 पान के पत्ते तथा सुपारी, लौंग, इलायची, जौ, तेल, मिठाई और फल सहित अन्य पूजा सामग्री अर्पित की जाती है।
इस दिन महिलाएँ व्रत रखती हैं और अन्न का सेवन नहीं करतीं। पूजा के बाद 365 दीपक जलाकर परिक्रमा और आरती की जाती है। इसके बाद महिलाएँ अपने घर लौटती हैं और इस दिन रसोई में न जाने की भी परंपरा है।
लीला शर्मा जी ने बताया कि मान्यता के अनुसार यह व्रत माँ गौरा ने भी रखा था और तभी से यह परंपरा चली आ रही है। यह परंपरा गोरखा समुदाय में होती है।
इस व्रत को जाने-अनजाने में हुई छुआछूत या अशुद्धि के पापों के निवारण तथा अपने और परिवार के सुख-शांति एवं मंगल की कामना के लिए रखा जाता है।