गोरखाली समाज की महिलाओं द्वारा हरितालिका तीज का पावन पर्व पारंपरिक श्रद्धा, निष्ठा और उल्लास के साथ मनाया गया। गोरखाली संस्कृति में इस व्रत का अत्यंत विशिष्ट धार्मिक और सामाजिक महत्व है, जिसमें सुहागिन महिलाएं अपने पति की दीर्घायु व अखंड सौभाग्य तथा अविवाहित कन्याएं सुयोग्य वर की प्राप्ति के लिए निर्जला व्रत रखती हैं।
पर्व का महत्व एवं परंपरा
अखंड आस्था का प्रतीक: पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर तपस्या और कठोर निर्जला व्रत किया था। उसी परंपरा का निर्वहन करते हुए गोरखाली महिलाएं यह व्रत पूरी निष्ठा के साथ करती हैं।
पारंपरिक वेशभूषा और उल्लास: इस अवसर पर गोरखाली महिलाएं लाल व चटकीले रंगों की पारंपरिक पोशाक, पोते (रंगीन मोतियों की माला), तिलहरी और आभूषणों में सज-धज कर एकत्रित हुईं।
सांस्कृतिक प्रस्तुतियां: महिलाओं ने समूह में पारंपरिक तीज गीतों पर लोकनृत्य प्रस्तुत किए और एक-दूसरे को सुख-समृद्धि की शुभकामनाएं दीं।
विधि-विधान से पूजन: भगवान शिव और माता पार्वती की विधिवत पूजा-अर्चना कर परिवार के कल्याण, स्वास्थ्य और शांति की प्रार्थना की गई।
हरितालिका तीज केवल एक धार्मिक अनुष्ठान ही नहीं, बल्कि गोरखाली महिलाओं के आपसी सौहार्द, सांस्कृतिक धरोहर और सामाजिक एकता को सुदृढ़ करने का प्रमुख पर्व है। कार्यक्रम के अंत में उपस्थित सभी व्रतियों एवं श्रद्धालुओं में प्रसाद वितरित किया गया।गोदावरी थापली ने भी अपनी बड़ी बहन के यहाँ अपनी बहनों, सखी सहेलियों के साथ हर्षोल्लास के साथ पावन पर्व मनाया। इस अवसर पर, अनिता थापा, रश्मि, शशि, आरती, रक्षा, राधा आनन्द, शालू थापा, शोभा, पूनम, लता, शबनम, मीना, शिप्रा, मीनू थापा, सुरेशी रावत, गीता घाले, श्रुतिका, मुन्नी बिष्ट, कुसुम थापा, तीन, शोभा थापा, बीना बिष्ट आदि शामिल रहे।