प्रेमनगर में नंदा की चौकी के पास टोंस नदी पर क्षतिग्रस्त पुल का लगभग ₹16 करोड़ की लागत से जीर्णोद्धार किया गया था, लेकिन आमजन के लिए खोले जाने के मात्र 16 दिनों के भीतर ही पुल की एप्रोच रोड का हिस्सा ढह जाना बेहद गंभीर मामला है। यह घटना निर्माण कार्य की गुणवत्ता और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े करती है।
यदि सरकार वास्तव में संवेदनशील होती, तो इस मामले में तत्काल जवाबदेही तय की जाती, संबंधित ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट किया जाता तथा जिम्मेदार विभागीय अधिकारियों को निलंबित कर निष्पक्ष जांच कराई जाती।
उत्तराखंड में अब ऐसा प्रतीत होता है कि “भाजपा सरकार” और “भ्रष्टाचार” एक-दूसरे के पर्याय बन चुके हैं। सरकार भ्रष्टाचार के खिलाफ बड़े-बड़े दावे तो करती है, लेकिन कार्रवाई अक्सर केवल छोटी मछलियों तक सीमित रह जाती है। बड़े मगरमच्छों पर हाथ न डालना शासन की मंशा पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
इस मामले में अधिकारियों की प्रारंभिक रिपोर्ट में पुल की एप्रोच रोड के ढहने के पीछे प्रतिबंधित क्षेत्र में अवैध खनन को भी एक कारण बताया जा रहा है। यदि ऐसा है, तो यह और भी गंभीर विषय है। प्रश्न यह है कि प्रतिबंधित क्षेत्र में अवैध खनन को रोकने की जिम्मेदारी किसकी थी और उस जिम्मेदारी का निर्वहन क्यों नहीं किया गया?
किसी ठेकेदार का किसी राजनीतिक दल से जुड़ा होना या न होना महत्वपूर्ण नहीं है। सबसे महत्वपूर्ण है निर्माण कार्य की गुणवत्ता और जनता के धन का सही उपयोग। यदि गुणवत्ता में लापरवाही सिद्ध होती है, तो संबंधित ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट किया जाना चाहिए तथा विभागीय अधिकारियों के विरुद्ध भी सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई होनी चाहिए।
सबसे चिंताजनक बात यह है कि ऐसी गंभीर घटनाओं के बावजूद न तो जिम्मेदारी तय होती है और न ही प्रभावी कार्रवाई दिखाई देती है। जब तक जवाबदेही सुनिश्चित नहीं होगी, तब तक जनता के धन की बर्बादी और विकास कार्यों में लापरवाही का सिलसिला रुकना मुश्किल है

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