देहरादून में हर्षोल्लास के साथ चल रहा आर्यिका रत्न 105 श्री पूर्णमति माताजी का चातुर्मास, समवशरण विधान में उमड़ रहे श्रद्धालु - hindikhabar24x7.com

देहरादून में हर्षोल्लास के साथ चल रहा आर्यिका रत्न 105 श्री पूर्णमति माताजी का चातुर्मास, समवशरण विधान में उमड़ रहे श्रद्धालु

संत शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज एवं नवाचार्य श्री 108 समयसागर जी महाराज की परम प्रभावक शिष्या आर्यिका रत्न 105 श्री पूर्णमति माताजी का ससंघ मंगल चातुर्मास देवभूमि उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में अत्यंत हर्षोल्लास एवं भक्तिभाव के साथ संपन्न हो रहा है। चातुर्मास के अंतर्गत प्रतिदिन धार्मिक अनुष्ठानों, पूजन-अर्चना एवं आध्यात्मिक गतिविधियों के साथ दिनचर्या का शुभारंभ होता है।

माताजी के मंगल आशीर्वाद से मध्य प्रदेश निवासी विधानाचार्य दीपक जैन शास्त्री द्वारा विभिन्न धार्मिक विधान विधि-विधानपूर्वक संपन्न कराए जा रहे हैं। इसी क्रम में समवशरण विधान के माध्यम से श्रद्धालु धर्माराधना एवं पुण्यार्जन कर रहे हैं।

समवशरण तीर्थंकर भगवान की दिव्य धर्मसभा : आर्यिका पूर्णमति माताजी

इस अवसर पर परम पूज्य आर्यिका रत्न 105 श्री पूर्णमति माताजी ने समवशरण के आध्यात्मिक एवं धार्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि जैन धर्म में समवशरण तीर्थंकर भगवान की उस दिव्य एवं भव्य धर्मसभा को कहा जाता है, जिसका निर्माण केवलज्ञान प्राप्त होने के पश्चात भगवान की दिव्यध्वनि के माध्यम से समस्त जीवों के कल्याण एवं धर्मोपदेश के लिए होता है।

माताजी ने समवशरण की प्रमुख विशेषताओं का वर्णन करते हुए बताया कि इसके चारों द्वारों के बाहर भव्य मानस्तंभ होते हैं, जिनके दर्शन से व्यक्ति के अहंकार एवं मान का क्षय होने की भावना जागृत होती है। समवशरण में आठ भूमियों का वर्णन मिलता है, जिनमें चैत्य प्रासाद भूमि, जल खातिका भूमि, लतावन भूमि, उपवन भूमि, ध्वज भूमि, कल्पवृक्ष भूमि, भवन भूमि तथा श्रीमंडप भूमि प्रमुख हैं।

श्रीमंडप भूमि में गंधकुटी के चारों ओर बारह सभाओं की व्यवस्था होती है, जहाँ मुनिराज, आर्यिकाएँ, देव-देवियाँ, मनुष्य तथा तिर्यंच जीव अपने-अपने निर्धारित स्थान पर बैठकर तीर्थंकर भगवान की दिव्यध्वनि का लाभ प्राप्त करते हैं। श्रीमंडप के मध्य में गंधकुटी एवं सिंहासन पर तीर्थंकर भगवान अष्ट प्रातिहार्यों सहित विराजमान होते हैं।

समवशरण विधान से आत्मिक शुद्धि एवं पुण्यार्जन की भावना

समवशरण विधान जैन समाज का एक विशिष्ट धार्मिक अनुष्ठान है। इसमें समवशरण की दिव्य संरचना, आठ भूमियों, मानस्तंभ, चैत्य प्रासाद एवं बारह सभाओं का प्रतीकात्मक स्वरूप स्थापित कर पूजन-अर्चना की जाती है। इस विधान के माध्यम से श्रद्धालु तीर्थंकर भगवान के समवशरण का भावपूर्ण स्मरण एवं मानसिक दर्शन करते हुए आत्मिक शुद्धि, पुण्यार्जन तथा धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ने की भावना भाते हैं।

आचार्य श्री विद्यासागर जी महाराज की चरण पादुकाओं का हुआ शुद्धिकरण

इसी क्रम में परम पूज्य संत शिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज की पावन चरण पादुकाओं का शुद्धिकरण आज दोपहर संत निवास स्थित भद्रबाहु गुफा में किया गया। इस धार्मिक कार्यक्रम में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर पुण्य लाभ प्राप्त किया तथा श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ धर्माराधना की।

देश-विदेश से पहुंच रहे श्रद्धालु

मीडिया समन्वयक मधु जैन ने बताया कि परम पूज्य आर्यिका रत्न 105 श्री पूर्णमति माताजी के मंगल चातुर्मास एवं समवशरण विधान का लाभ लेने के लिए देहरादून सहित विभिन्न शहरों तथा विदेशों से भी श्रद्धालु पहुंच रहे हैं। श्रद्धालु माताजी के दर्शन कर उनका आशीर्वाद प्राप्त करने के साथ ही सेवा, पूजन, शंका समाधान एवं महाआरती में भाग लेकर धर्मलाभ उठा रहे हैं।

इस अवसर पर सकल दिगंबर जैन समाज, देहरादून, श्री विद्या समय पूर्ण वर्षायोग समिति 2026, देहरादून, जैन भवन कार्यकारिणी के पदाधिकारी, विभिन्न धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाओं के प्रतिनिधि, सदस्य तथा बड़ी संख्या में बाहर से आए श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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